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खरोरा-कोसरंगी में जहरीली प्रतिबंधित मांगुर मछली का उत्पादन

प्रतिबंध के बावजूद हो रहा उत्पादन, नींद में फिसरी विभाग

खरोरा इलाके की पुलिस ने आंख बंद की कैंसर का रोग फैलाने वाली मछली का बड़े पैमाने में अवैध उत्पादन

विश्व स्वास्थ्य संगठन विश्व सहित पूरे भारत ने जहरीली मछली को किया प्रतिबंध

गृहमंत्री के क्षेत्र में प्रतिबंधित जहरीली मछलियों को जिंदा दफनाया गया

राजधानी सहित पूरे प्रदेश में कैंसर जैसे बड़े रोग फैलाती मछलियां खुलेआम बेधडक़ विश्व में प्रतिबंधित होने के बावजूद बिक रही, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, मत्स्य विभाग बेखबर

अनादि न्यूज़ डॉट कॉम, रायपुर। छत्तीसगढ़ में प्रतिबंध के बावजूद मांगुर मछली का उत्पादन हो रहा है। इस मामले में पुलिस और फिसरी विभाग कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। राज्य में उत्पादन के साथ ही पड़ोसी राज्यों से मांगूर मछली की तस्करी भी बड़े पैमाने पर हो रही है। गृहमंत्री के जिले में मांगुर(मोंगरा) मछली के उत्पादन करने वालों पर कार्रवाई की गई थी लेकिन अन्य जिलों में मांगुर मछली पालन करने वालों पर कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है। जानकारी के अनुसार राजधानी से लगे खरोरा से पांच किलोमीटर दूर कोसरंगी गांव में दो किसानों द्वारा मांगुर मछली का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। जिस पर संबंधित विभाग की नजर नहीं है, अगर है भी तो इस अवैध उत्पादन पर रोक नहीं लगाई जा रही है। गांव के लोगों का कहना है कि पुलिस और फिसरी विभाग से कई बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। गांव वालों ने बताया कि सुखदेव और मनीष ये दो किसान मछली पालन कर रहे हैं और इनके द्वारा मांगुर मछली का उत्पादन किया जा रहा है।

कोंडागांव जिले में भी प्रशासन ने दो साल पहले करीब 30 क्विंटल मांगुर मछली को जमीन में दफना दिया था। मांस खाने वाली इस मछली का उत्पादन, परिवहन और सेवन पूरे भारत में बैन है। आंध्र प्रदेश के तस्कर ष्टत्र के रास्ते इस मछली की तस्करी कर रहे थे। बीच रास्ते में ट्रक खराब हुआ और प्रशासन को इसकी खबर मिली। जिसके बाद बीच जंगल में गड्ढा खोदकर एक ट्रक मछली को नष्ट कर दिया गया है। मामला जिले के बोरगांव थाना क्षेत्र का है।

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जानकारी के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के कुछ तस्कर ट्रक में 30 क्विंटल मांगुर मछली भरकर उत्तर प्रदेश जा रहे थे। बस्तर के कोंडागांव जिले के बोरगांव में हृ॥-30 पर ट्रक खराब हो गया। जिसके बाद तस्करों ने दूसरा ट्रक मंगवाया और उसमें सारी मछली को लोड कर रहे थे। इस बीच गांव वालों की नजर इन पर पड़ी। ग्रामीणों ने इस बात की खबर फौरन प्रशासन को दी। जिसके बाद मत्स्य विभाग की टीम मौके पर पहुंची। जंगल में मत्स्य विभाग की टीम ने एक बड़ा सा गड्ढा खुदवाया और उस गड्ढे में सारी मछलियों को डलवा दिया। जिसके बाद गड्ढे को वापस मिट्टी से पाट दिया गया। मत्स्य विभाग की अधिकारी मीनाक्षी मरकाम ने कहा, इस मछली का सेवन करना और इसका उत्पादन करना पूरी तरीके से बैन है। इसकी जानकारी मिलते ही कार्रवाई की गई है। इन मछलियों की कीमत करीब लगभग 6 लाख है।

क्यों है बैन?: मांगुर मछली मगरमच्छ और देसी मोंगरी मछली की प्रजाति है। इस मछली को जिस भी तालाब में डाला जाता है वह तालाब की अन्य मछलियों को अपना आहार बना लेती है। पानी का इको सिस्टम खत्म कर देती है और इंसानों का मांस तक खा जाती है। अफसरों का मानना है कि आम मछलियों की तुलना में ये काफी जल्दी बड़ी होती हैं। इसे खाने से डायबिटीज और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों के होने की आशंका बहुत बढ़ जाती है। पूरी तरह से नुकसानदेह इस मछली को इसके बावजूद पाला और बेचा जाता है, क्योंकि इसे खाने वाले भी बड़ी तादात में हैं।

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प्रदेश सहित राजधानी के आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में कृत्रिम तालाब बनाकर मत्स्य पालन के नाम पर बड़ी संख्या में प्रतिबंधित मांगुर मछली का उत्पादन हो रहा है। जिसे मछली उत्पादक मोंगरी के नाम में बेच कर लोगों को धामी जहर दे रहे है। मांगुर मछली खाने के लोगों को कई तरह की बीमारियों का पता चलने के बाद से सरकार ने मांगुर मछली के उत्पादन और बचने पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह भाजपा शासनकाल के समय से पिछले 7-8सालों से प्रतिबंध लगा हुआ है। अधिक कमाई के लालच में मछली उत्पादक चोरी छिपे मांगुर का उत्पादन कर मोंगरी के नाम से बड़ी आसानी से मार्केट में बेच रहे है। जिसे तस्करी के रास्ते एक राज्य से दूसरे राज्य में पहुंचाया जा रहा है। हाल ही में इसका खुलासा कोंडागांवमें हुआ जहां एक मछली से भरे वाहन के दुर्घटनाग्रस्त होने पर उसमें परतिबंधित मछली मांगुर मिले जिसे प्रशासन ने तत्काल नष्ट कराया। राजधानी में स्वास्थ्य अमले को मछली मार्केट में जाकर जांच करनी चाहिए कि कहीं मोंगरी ने नाम पर यहां भी मांगुर तो नहीं बेचा जा रहे है। भारत सरकार ने मांगुर के उत्पादन और पूरी तरह बैन लगा रखा है उसके बाद भी छुटभैया नेता और मांगुर माफिया तस्करी के रास्ते लोगों को मांगुर परोस कर गंबी्र बीमारियों से पीडि़त कर रहे है।

गौलतरब है कि भारत सरकार में साल 2000 में ही थाई मांगुर नामक मछली के पालन और बिक्री पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसकी बेखौफ बिक्री जारी है। इस मछली के सेवन से घातक बीमारी हो सकती है. इसे कैंसर का वाहक भी कहां जाता है। ये मछली मांसाहारी होती है, इसका पालन करने से स्थानीय मछलियों को भी क्षति पहुंचती है. साथ ही जलीय पर्यावरण और जन स्वास्थ्य को खतरे की संभावना भी रहती है। थाईलैंड की थाई मांगुर मछली के मांस में 80 प्रतिशत लेड और आयरन की मात्रा होती है। इसलिए इसका सेवन करने से कई प्रकार की इस मछली को खाने से लोगों में गंभीर बीमारी हो सकती है. बता दे की मांगुर मछली मांसाहारी मछली है, यह मांस को बड़े चाव से खाती है। सड़ा हुआ मांस खाने के कारण इन मछलियों के शरीर की वृद्धि एवं विकास बहुत तेजी से होता है. यह कारण है क्य ह मछलियां तीन माह में दो से 10 किलोग्राम वजन की हो जाती हैं। इन मछलियों के अंदर घातक हेवी मेटल्स जिसमें आरसेनिक, कैडमियम, क्रोमियम, मरकरी, लेड अधिक पाया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत अधिक हानिकारक है। थाई मांगुर के द्वारा प्रमुख रूप से गंभीर बीमारियां, जिसमें हृदय संबंधी बीमारी के साथ न्यूरोलॉजिकल, यूरोलॉजिकल, लीवर की समस्या, पेट एवं प्रजनन संबंधी बीमारियां और कैंसर जैसी घातक बीमारी अधिक हो रही है।

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थाईलैंड में विकसित थाई मांगुर पूरी तरह से मांसाहारी मछली है. इसकी विशेषता यह है कि यह किसी भी पानी (दूषित पानी) में तेजी से बढ़ती है, जहां अन्य मछलियां पानी में ऑक्सीजन की कमी से मर जाती है, लेकिन यह जीवित रहती है. थाई मांगुर छोटी मछलियों समेत यह कई अन्य जलीय कीड़े-मकोड़ों को खा जाती है. इससे तालाब का पर्यावरण भी खराब हो जाता है।