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समय से 42 मिनट पहले ISS पहुंचेंगे शुभांशु: बोले- नमस्कार फ्रॉम स्पेस, अंतरिक्ष में बच्चे की तरह चलना-खाना सीख रहा हूं.

अनादि न्यूज़ डॉट कॉम, भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला एक्सिओम-4 (Ax-4) मिशन के तहत स्पेसएक्स ड्रैगन कैप्सूल में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की ओर बढ़ रहे हैं। यह आज यानि 26 जून को करीब 28 घंटे के सफर के बाद दोपहर 3:48 बजे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचेंगे। यह तय समय से 40-45 मिनट पहले डॉक करेगा। ड्रैगन कैप्सूल ISS से लगभग 200-400 मीटर की दूरी पर है। क्लोज अप्रोच जोन में प्रवेश कर चुका है।भारतीय एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला सहित चारों एस्ट्रोनॉट आज यानी, पहले इनके पहुंचने का समय 4:30 बजे था। यानी, समय से 42 मिनट पहले ये एस्ट्रोनॉट स्पेस स्टेशन पहुंच रहे हैं।

यह यान 28,000 किमी/घंटा की रफ्तार से 418 किमी ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। लॉन्च के बाद से यह लगभग 26 घंटे की यात्रा पूरी कर चुका है और अब अंतिम चरण में है। इसके लिए यान ने कई कक्षीय मैन्यूवर्स (orbital maneuvers) किए हैं ताकि ISS की कक्षा के साथ अलाइन हो सके। एक्सियम मिशन 4 के तहत 25 जून को दोपहर करीब 12 बजे सभी एस्ट्रोनॉट ISS के लिए रवाना हुए थे। ये मिशन तकनीकी खराबी और मौसमी दिक्कतों के कारण 6 बार टाला गया था।

ड्रैगन कैप्सूल की डॉकिंग प्रक्रिया

ड्रैगन कैप्सूल की ISS के साथ डॉकिंग एक स्वचालित (autonomous) प्रक्रिया है, लेकिन शुभांशु और कमांडर पेगी व्हिटसन इसकी निगरानी करेंगे. यह प्रक्रिया सटीकता और सुरक्षा के लिए डिज़ाइन की गई है। इसे चार मुख्य चरणों में समझा जा सकता है…

रेंडेजवू (Rendezvous): ड्रैगन कैप्सूल लॉन्च के बाद 90 सेकंड के इंजन फायरिंग के साथ अपनी गति और दिशा समायोजित करता है. दोपहर 2:33 बजे IST तक, यान 400 मीटर नीचे और 7 किमी पीछे से शुरू हुआ और अब 200 मीटर की दूरी पर है। स्पेसएक्स और नासा के ग्राउंड कंट्रोलर यान के सिस्टम की जांच करते हैं।

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नजदीक पहुंचेगा (Close Approach): 200 मीटर की दूरी पर, ड्रैगन ISS के साथ सीधा संचार शुरू करता है. यह चरण 6 घंटे तक सुरक्षित पथ पर रह सकता है ताकि कोई जोखिम न हो।

अंतिम स्टेप (Final Approach): 20 मीटर की दूरी पर, ड्रैगन लेजर सेंसर, कैमरे और GPS का उपयोग करके ISS के हार्मनी मॉड्यूल के डॉकिंग पोर्ट से सटीक संरेखण करता है। यह कुछ सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से आगे बढ़ता है, जो बेहद धीमी और नियंत्रित गति है। शुभांशु इस दौरान यान की गति, कक्षा और सिस्टम (जैसे एवियोनिक्स और प्रणोदन) की निगरानी करेंगे।

सॉफ्ट और हार्ड कैप्चर (Soft and Hard Capture)

सॉफ्ट कैप्चर: मैग्नेटिक ग्रिपर यान को डॉकिंग पोर्ट की ओर खींचते हैं।

हार्ड कैप्चर: मैकेनिकल लैच और हुक यान को सुरक्षित करते हैं. एक दबाव-रोधी सील बनाई जाती है।

इसके बाद 1-2 घंटे की जांच होगी, जिसमें हवा के रिसाव और दबाव की स्थिरता की पुष्टि होगीष। इसके बाद क्रू ISS में प्रवेश करेगा।

एक बच्चे की तरह सीख रहा हूं

इससे पहले मिशन क्रू ने स्पेसक्राफ्ट से लाइव बातचीत की। इसमें शुभांशु ने कहा था- नमस्कार फ्रॉम स्पेस! मैं अपने साथी अंतरिक्ष यात्रियों के साथ यहां होने के लिए बहुत एक्साइटेड हूं। उन्होंने कहा- “जब हमें वैक्यूम में लॉन्च किया गया, तब मैं बहुत अच्छा महसूस नहीं कर रहा था। मैं बहुत सोया हूं। यहां एक बच्चे की तरह सीख रहा हूं… अंतरिक्ष में चलना और खाना कैसे है।”

41 साल बाद कोई भारतीय एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष में गया

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा और भारतीय एजेंसी इसरो के बीच हुए एग्रीमेंट के तहत भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को इस मिशन के लिए चुना गया है। शुभांशु इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर जाने वाले पहले और स्पेस में जाने वाले दूसरे भारतीय हैं। इससे 41 साल पहले राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत यूनियन के स्पेसक्राफ्ट से अंतरिक्ष यात्रा की थी।

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शुभांशु का ये अनुभव भारत के गगनयान मिशन में काम आएगा। ये भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन है, जिसका उद्देश्य भारतीय गगनयात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजना और सुरक्षित रूप से वापस लाना है। इसके 2027 में लॉन्च होने की संभावना है। भारत में एस्ट्रोनॉट को गगनयात्री कहा जाता है। इसी तरह रूस में कॉस्मोनॉट और चीन में ताइकोनॉट कहते हैं।