संसद में पेश होने वाले विधेयक
परिसीमन विधेयक, 2026: यह विधेयक परिसीमन आयोग की स्थापना करता है, जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश करेगा ताकि राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण किया जा सके. निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया जा सके और नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) तथा महिलाओं के लिए आरक्षण तय किया जा सके.
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: इसके माध्यम से सरकार ने लोकसभा की संरचना में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव रखा है, जिसका उद्देश्य निचले सदन के सदस्यों की संख्या को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 (815 राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से) करना है.
केंद्र शासित प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक, 2026: यह विधेयक केंद्र शासित प्रदेशों के कानूनों को परिसीमन और महिलाओं के लिए आरक्षण से संबंधित संशोधित संवैधानिक ढांचे के अनुरूप बनाता है.
विरोध की वजह क्या?
कांग्रेस और उसके सहयोगियों का केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में एक मजबूत आधार है. ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें लेकर उन्हें लगता है कि उत्तरी राज्यों की तुलना में यहां उन्हें कम लाभ मिलेगा. विपक्षी नेताओं का तर्क है कि अगर ऐसा होता है, तो उत्तर प्रदेश और केरल के बीच सीटों का मौजूदा अंतर 60 सीटें (80 बनाम 20) से बढ़कर 90 सीटें (120 बनाम 30) हो सकता है, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन और भी गहरा जाएगा.
एक लेख में सोनिया गांधी ने भी चेतावनी दी कि ये योजनाएं राजनीतिक प्रतिनिधित्व को काफ़ी हद तक बदल सकती हैं और संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर कर सकती हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोकसभा की सदस्य संख्या में कोई भी बढ़ोतरी न्यायसंगत होनी चाहिए.
विपक्ष ने दी आंदोलन की चेतावनी
इस पूरे मामले दक्षिण भारत के दो प्रमुख गैर-बीजेपी शासित राज्य तमिलनाडु और तेलंगाना परिसीमन के मुद्दे पर सरकार पर हमलावर हैं. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने चेतावनी दी कि अगर तमिलनाडु के साथ कोई अन्याय हुआ तो व्यापक आंदोलन होगा, जबकि तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने भी इसे अन्याय बताया है.
रेड्डी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र में सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की और कहा कि केवल जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों में वृद्धि करने से देश के संघीय संतुलन पर असर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि दक्षिणी राज्यों के लिए यह अनुपात आधारित मॉडल स्वीकार्य नहीं होगा और बिना उनकी चिंताओं को दूर किए आगे बढ़ने पर व्यापक विरोध होगा.
इसके अलावा कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी इस मुद्दे को उठाया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें प्रस्तावित प्रक्रिया के तहत अन्याय का सामना करना पड़ेगा. साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि संसद में दक्षिणी राज्यों की आवाज को कमज़ोर नहीं होने दिया जाना चाहिए.
सरकार की क्या है दलील?
सरकार का कहना है कि अभी सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय है, जबकि देश की आबादी और हालात काफी बदल चुके हैं. लंबे समय से सीटों का नया बंटवारा रुका हुआ था. इस विधेयक से वह रोक हटेगी और परिसीमन आयोग नए चुनावी क्षेत्र तय कर सकेगा. नए विधेयक में प्रावधान है कि नवीनतम उपलब्ध जनगणना आंकड़ों के आधार पर परिसीमन कर महिला आरक्षण लागू किया जा सकेगा. महिला आरक्षण 15 साल तक लागू रहेगा.
‘दक्षिण के राज्यों को भी लाभ’
विपक्ष के विरोध का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि संविधान संशोधन विधेयक के तहत लोकसभा की सीट बढ़ाकर अधिकतम 850 करने पर दक्षिणी राज्यों को भी लाभ होगा, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या आनुपातिक रूप से बढ़ाई जाएगी. उन्होंने कहा, दक्षिणी राज्य भाग्यशाली हैं कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने और आनुपातिक रूप से कम आबादी होने के बावजूद उन्हें लाभ मिलेगा, क्योंकि सीटों की संख्या आनुपातिक रूप से बढ़ाई जा रही हैं.
उन्होंने कहा कि अगर कोई विधेयकों के सभी प्रावधानों को ध्यान से देखे, तो स्पष्ट होगा कि हर राज्य, हर क्षेत्र और हर समुदाय का ध्यान रखा गया है और चिंता की कोई बात नहीं है. रिजिजू ने कहा कि पहले कुछ लोगों ने यह कहकर दक्षिणी राज्यों को गुमराह करने की कोशिश की थी कि सफल परिवार नियोजन के कारण उन्हें नुकसान होगा. उन्होंने कहा, कोई भी राज्य नुकसान में नहीं रहेगा. हर क्षेत्र और हर राज्य में सीटों में बढ़ोतरी का प्रावधान किया गया है.






